कोऊ काम न आवै हरि बिनु -2
हां..... हे कोऊ काम न आवै -2
हरि बिनु.......
रतन जड़ित कंचन के खंभा रचि रचि महल बनावै।
ताहि नीकारि करै घर बाहर छन एक रहन न पावै।।
हरि बिनु.......
पुत्र जन्म के वहीं अवसर मा हीरालाल लूटावै।
छोरि लियो गरदन का धागा तनिका रहम ना आवै।।
हरि बिनु.......
तिरिया कहै संग हम चलिबे ठूसि ठूसि धन खावै।
चलत बेरि मुंह फेरि के बैठे एको पग ना पठावै।।
हरि बिनु.......
यह दुनिया परपंच मोहिनी वैसे व्याल जग छावै।
कमलुदास कहै कर जोरे मिथ्या जन्म गवावै।
हरि बिनु.......
निर्देशक ; श्री राजेंद्र बहादुर सिंह ,श्री राजेंद्र सिंह (विषधर )
लेखक; शरद सिंह
